पंखुरी के ब्लॉग पे आपका स्वागत है..

जिंदगी का हर दिन ईश्वर की डायरी का एक पन्ना है..तरह-तरह के रंग बिखरते हैं इसपे..कभी लाल..पीले..हरे तो कभी काले सफ़ेद...और हर रंग से बन जाती है कविता..कभी खुशियों से झिलमिलाती है कविता ..कभी उमंगो से लहलहाती है..तो कभी उदासी और खालीपन के सारे किस्से बयां कर देती है कविता.. ..हाँ कविता.--मेरे एहसास और जज्बात की कहानी..तो मेरी जिंदगी के हर रंग से रूबरू होने के लिए पढ़ लीजिये ये पंखुरी की "ओस की बूँद"

मेरी कवितायें पसंद आई तो मुझसे जुड़िये

Friday, 2 September 2016

औरतें कलाकार होती हैं



औरतें खुश हो जाती हैं
छोटी छोटी चीजों में
मसलन टीवी पर
उनकी पसंद का चैनल चला दिया जाए
या फिर किसी दिन
उनके खाना बनाने की छुट्टी कर दी जाए
ऐसी ही तमाम छोटी छोटी बातें
क्योंकि वो जानती हैं
बड़ी बातें बड़ी चीजें
उनके लिए नहीं हैं
उस बारे में बात करना ही उन्हें
जाहिल गंवार की श्रेणी में खड़ा कर देता है
इसलिए खुश होती हैं छोटी चीजों से,
अपने अपने घर में
सभी साक्षी और सिंधु हैं
जो लड़ रही हैं
अपने वजूद के लिए- नहीं
अपनी इच्छाओं के लिए
उनमें से सबको कहाँ जानते हैं हम
हाँ कुछ एक जो इस लड़ाई में जीत जाती हैं
वो नजर में आ जाती हैं
पर उनका रास्ता कितना पथरीला था
कौन समझेगा !
और बाकी का क्या
कुछेक तो बीच में ही दम तोड़ देती हैं
और कुछ आखिर में
और बाकी सब
अपनी गृहस्थी की गाडी चलाने के लिए
संतुष्ट करती रहती हैं
पुरुष का अहम
खुश होती रहती है
खुश होती नहीं है औरतें अपनी इच्छाएं मार के
बस नाटक भर करती है
गजब की कलाकार होती हैं औरतें ।
---पारुल'पंखुरी'
शामली (उत्तर प्रदेश )
२७ अगस्त २०१६


Sunday, 13 March 2016

आज एक दिन






















आज एक दिन
मैं शिकायत नहीं करुँगी
अपने अधिकारों की
बहने नहीं दूंगी आँखों से भावों को

भूल जाउंगी
इस निष्ठुर समाज का सच
स्त्री पुरुष के वर्चस्व की दौड़

दिन के उजाले में
जन्म दूंगी सपनों को
पलकों के झूले पर झुलाउंगी

सिखाउंगी उड़ना
नन्हे नन्हे सपनों को
हौसलों के पंखों से बेझिझक

उड़ता देख उन्हें इतराउंगी
गर्व करुँगी अपने स्त्रीत्व पर
धन्यवाद करुँगी कुदरत का
इस असीम सुख के लिए

भूल जाउंगी कमजोरियां
सिर्फ महसूस करुँगी
अपना औरत होना
और प्यार करुँगी
खुद से ....
आज
कल
हमेशा....।

~~~पारुल'पंखुरी



Wednesday, 27 January 2016

शहीद की चिट्ठी

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रकाशित मेरी रचना "शहीद की चिट्ठी" उन सभी परिवारों को मेरा नमन है जिन्होंने अपने बेटों को देश की खातिर खो दिया । उन सबको दिल से सलाम ।
जय हिन्द

~~~पारुल'पंखुरी'




















शहीद की चिट्ठी
माँ,
कल छब्बीस जनवरी है ;मुझे गए हुए भी छब्बीस हफ्ते हो चुके हैं मगर तेरे आँसुओं की नदी अभी तक सूखी नहीं ये देख कर मै बेचैन हो जाता हूँ माँ |
   मुझे निवाला खिलाये बिना कभी खाना नहीं खाया तूने मालूम है अब वो निवाले कैसे काँटों से चुभते हैं तुझे और मौन होकर आंसुओं के साथ उन्हें भी निगल लेती है तू | सबसे छुपा सकती है तू मगर मुझसे नहीं ,रात को लेटे लेटे जिस आँचल से तू अपने आँसू पोंछती है उसी आँचल से मै अपना सर ढक लेता हूँ जो मुझे भीगा भीगा महसूस होता है, फिर मै तेरे चरणों में सिर झुकाता हूँ और तेरे सीने से लगकर लेट जाता हूँ मगर मै तेरे आँसू क्यूँ नहीं पोंछ पाता माँ  !
  सुबह जब अनजाने में तू मेरा नाम पुकारती है मै बहुत खुश हो जाता हूँ मगर तू मेरी कमीज को सीने से लगाये सुबक सुबक के रोने लगती है | धरती माँ का कर्ज चुकाते चुकाते तेरी ममता को तरसता छोड़ गया मै माँ मुझे माफ़ कर देना |
     तूने ही मुझे शिक्षा दी थी की “सबसे पहले धरती माँ उसके बाद तेरी माँ” | मै तो एक झटके में चला गया माँ मगर तू  हर दिन हर पल मेरी ममता में तड़फ रही है मर रही है  | तू जानती थी की तू मेरे बिना नहीं रह पाएगी फिर भी भारत माता के लिए मुझे कुर्बान कर दिया; माँ, तुझे प्रणाम है |
    जब तक तेरे जैसी माएं भारत की धरती पर हैं दुश्मन इसका बाल भी बांका नहीं कर सकता | कल मुझे जो सम्मान मिलने वाला है उसकी सच्ची हकदार तू है माँ इस देश की सच्ची सैनिक तेरे जैसी माएं हैं | उन सभी माँओं को सलाम |
                          जय हिन्द
                                 तेरा शहीद बेटा
(जो और सौ बार भारत माँ पर शहीद होने को तैयार है )



रचना-- पारुल'पंखुरी'
२५ जनवरी २०१६ 

Thursday, 30 April 2015

रचनाएँ





दोस्तों एवं परिवार के सदस्यों आप सबकी शुभकामनाओं से आज दिल्ली/एनसीआर के अखबार ट्रू टाइम्स में मेरी दो रचनाओं को प्रकाशित किया गया है मैं सम्पादन टीम की ह्रदय से आभारी हूँ ।
आप सभी का भी हार्दिक आभार रचनाओं पर अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा |

~~~पारुल'पंखुरी'

रचना -१ 

देह्शाला
भोग का प्याला
पैर की जूती
कपडा फटा पुराना
बिना कुण्डी वाले कमरे में बैठी वैश्या
चलती बस में भेडियो से जूझती आवारा
कूड़े के ढेर पे पड़ा अधनुचा जिस्म
धुएं निकालता फफोलो से भरा चेहरा
लपटों में लिपटा अधजला बदन
खून में लथपथ सिसकती आवाज
कुछ भी समझ लो
बस ...
औरत को इंसान समझने की भूल मत करना

-------------------------पारुल'पंखुरी'

(आखिरी पंक्ति औरतो को संबोधित करते हुए लिखी गयी है )
रचना २--

विधा-- हाइकु

बेवक़्त वर्षा
किसान पर मार
धान बेकार

सपने बोता
हलधर बरसों
रोई सरसों

फागुन गीत
कृषक कैसे गाये
मेघ  रुलाएं

सीलता चूल्हा
महंगाई की मार
खेप बेकार

और आखिर में एक विनती ईश्वर से ....

थामो बारिश
रहम बरसाओ
सूर्य दिखाओ


--पारुल'पंखुरी'



                                                     


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...